कुछ कहते कहते रुक जाता हूँ ,सोचता हूँ ,क्या अभी?या सही समय का इंतज़ार करते है।ये सही समय क्या है ,शायद ये वो समय हैं जब ,आपको लगता हैं कि,पासा आपके खेमें में हैं,या वो जब आप उसके बाद के हालात को काबू कर सके।पता नहीं, दोस्त ये सही समय होता भी हैं या नहीं।लोग कभी कहते हैं जो जब किया तब ही करना चाहिए था,तो कभी कहते हैं थोड़ा रुक जाते,और सही समय का इंतज़ार कर लेते।यानि जैसा सोच था वैसा हुआ तो सही समय था,और अगर नहीं हुआ तो ?तो क्या!थोड़ा और रुक जातेसही समय का इंतज़ार कर लेते।जैसे मैं रुक गया था यह लिखने मेंसही समय का इंतज़ार करने में।
Tuesday, June 2, 2020
गलत समय
Friday, May 29, 2020
मैं ढूँढ़ रहा हूँ
मैं ढूँढ़ रहा हूँकही रास्तो पर तो कही कोनो मे,इंसान तो मिल रहे हैं ,उनकी इंसानियत को ढूँढ़ रहा हूँकलम उठाने वालों की काली स्याही को ढूँढ़ रहा हूँ,रुह काँप जाने वाली कहानियों को ढूँढ़ रहा हूँ,उन कहानियों में अपने स्वार्थ को ढूँढ़ रहा हूँ।मैं स्वार्थी हूँ,अपना काम बख़ूबी निभा रहा हूँ|कटाक्ष भरता हूँ और, भूलता जा रहा हूँ|गलती तुम्हारी है जो मुझसे उम्मीदे कर रहे हो,इन आस भारी नज़रों से मुझे देख रहे हो|मैं कहाँ आज तक सामने आया हूँ, जो आज आऊँगाबस सवालों के क़तार लगा कर, फिर मर जाऊँगामेरी इंसानियत को मत परखों जो बची नहीं,ये मैं अपना हाल बता रहा हूँ, तुम्हारा नहीं,ये मैं अपनी बात कर रहा हूँ , तुम्हारी नहीं|मानो तो तुम भी कटाक्ष भरो,हालातों को सुधारने की कोशिश नहीं|किसी और से उम्मीद बाँधो और शांत हो जाओ,मरने दो जो मर रहे हैं, बचने की खुशी मनाओ|अगर तुम नहीं रहोगे तो ये सब कौन सोचेगा,हर एक अगर लड़ेगा तो उनकी बातें कौन करेगा?चलो अपने काम में फिर लग जाते हैंजब तक नया विषय नहीं मिलता, मर जाते हैं।ये समाज नहीं सुधरेगा और मरने तो नहीं देगाकुछ निर्दयी ज़रूर करेगा और कटाक्ष भरने देगा।बस तब तक ही तो मरना हैं,शांत रहना है और स्वार्थ ढूँढ़ना हैं।
Monday, May 25, 2020
शाम का शोर
मैंने शाम गुज़रते देखा हैं।एक जगह बैठे उसे रात, फिर दिन,और फिर वापिस आते देखा हैंउसे असाढ़ में तपते, माघ में ठिठुरतेतो सावन में झूमते देखा है।कभी जुगनू जैसा चमकते,काली स्याही में बदलते,कभी सतरंगो से भरे तो, कभीनीले रंग में सफेद को घुलते देखा है।उसे ठहरते देखा हैनन्हे परिंदों संग ओझल होते देखा हैउनके पंखों संग खेलते देखा हैमैंने शाम...... को गुज़रते देखा है।चबुतरे पर लेट के,कमरे की किवाड़ों से झाँकते,छज्जे पर बैठ के, तो कभीखुले मैदानों में दौड़ते देखा है।गाँव के सुकूँ में देखा है,शहर की चकाचौंध मे देखा है,घाट किनारे बैठ कर देखा हैंसमंदर की रेत जैसे भीगते देखा हैं।बचपन में उससे रेस लगाने से,जवानी में उस से हारते देखा हैदोस्तो के साथ देखा है, उनके बाद देखा है।खुली आँखों से देखा हैमूंद कर उनपर बसते देखा हैमैंने शाम में..... ज़िंदगी को गुज़रते देखा हैकिसी का हाथ पकड़ चलते ,तो उस हाथ के न होने पर रोते देखा हैअकेले पन के मायूसी में,तो दिल भर आये खामोशी में देखा हैमस्त मौला मग्न झूमतेतो संग गुनगुनाते देखा है।तुम्हारे साथ उसे रोते देखा हैतुम्हारे साथ उसे खोते देखा हैंसंग कई शामो को गुज़ारने से लेकर,उन शामो को अपना बनाते देखा हैमैंने तुम्हें...... शाम को रोकते देखा है।बंगले के आलिशान बालकॉनी से,टिन से ढकी झोपड़ी से,किसी को उसे पूजते,तो किसी को उससे जूझते देखा है ।मैंने शाम तले,दो दुनिया को बसते देखा हैं।उस संग आशाओं को मारते देखा है,उस संग सपनों को संजोते देखा है,मैंने शाम की सच्चाइयों को देखा है,उसे निर्दयी होते, मरती परछाइयों को देखा है।मैंने शाम रहते...... लोगो को गुज़रते देखा है।शाम को खास से आम बनते देखा हैकहने वालों के किस्सों से खोते देखा हैलिखने वालों को उसे मिटाते देखा हैशाम से जुड़े रिश्तों को टूटते देखा है।कभी शाम को अकेला देखा करता था,आज उसे अकेले होते देखा है।परिंदो को उससे मुँह मोड़ते देखा हैशाम के सुकूँ को शोर बनते देखा हैउसमे अपनी जीत को देखा करता था,आज खुद सा बेबस होते देखा हैं।यादों से बाहर निकल के,उसे सच्चाई को घूँटते देखा है।गहरे काले अंधेरे में समाते देखा है।कभी अज़ाद हुआ करता थाअब फंदे में लिपटते देखा है।मैंने आज...... शाम को मरते देखा है।
Sunday, May 24, 2020
पंद्रह मिनट का साधारण शहर
कोई मुझसे बचपन मे पूछता कि मुझे कहाँ जाने का मन करता है तो मैं कहता रेनुकूट।
घबराइए मत, इस शहर में ऐसा कुछ भी खास नहीं है जिसके लिए ये प्रसिद्ध हो और आपको अपनी ओर खींच कर ले जाए।
क्या पता इस शहर को देख लेने के बाद यहाँ दोबारा जाने का खायल भी न आए, शायद रेनुकूट वैसा हैं ही नहीं जैसी तस्वीर मेरे दिमाग में अभी तक बनी हुई हैं। शायद लोगो का इस जगह को न जान पाना बिल्कुल सही है, शायद ये मैं ही हूँ जो इसे इतना खास बनाने की कोशिश में लगा हुआ है।
मेरे गाँव जाने के दो रेल रूट हैं, एक जिसमे रेनुकूट आता हैं और एक जिसमे नहीं। अक्सर अच्छी ट्रेन से जाने की होड़ में मैं हमेशा रेनुकूट से दूर रह जाता था| कैसी बेवकूफ़ी हैं न कि कोई साधारण ट्रेन के स्लीपर क्लास में बैठ कर जाने की ज़िद करे, वो भी सिर्फ पंद्रह मिनट के साधारण से शहर को देखने के लिए जिसके बारे में लोगो को पता तक नहीं हैं, लेकिन, वो कहते हैं न कि तीर्थ से ज़्यादा सुखन्द तीर्थयात्रा मे होती हैं। मेरी इस तीर्थयात्रा का सबसे सुकूँ भरा लम्हा उस पंद्रह मिनट के शहर को देखने का होता था।
छोटे बड़े टीले, उनके पीछे से निकलता फैक्ट्री का धुँआ, छोटे छोटे कस्बे जो कभी ट्रेन से ऊपर, कभी उसकी सतेह पर तो कभी उसके नीचे, धूप में चमकती फैक्ट्री, खपड़े के मकान, पहाड़ और तीन या चार प्लेटफार्म का छोटा सा स्टेशन जहाँ ट्रेन सिर्फ दो मिनट के लिए रुकती थी, जिसकी नाराज़गी मेरी रेल विभाग से हमेशा रहेगी । बस इतने से शहर के लिए आखिर कौन इतनी तकलीफ़े उठता हैं, और क्यों?...............
न जाने कितने साल हो गए रेनुकूट को वैसा का वैसा देखे, आख़िर कब देखा था ये भी याद नहीं। मुझे खुशी हैं इस बात कि की मैं कभी भी इस शहर को अच्छे से देख नहीं पाया, शायद इस ही वजह से ऐसा कुछ लिख भी पा रहा हूँ, शायद इसे जान लेने के बाद मेरा नज़रिया और मेरी आँखों में बसी इसकी तस्वीर दोनों बदल जाए।......
इसलिए मैंने तय किया है कि मुझे रेनुकूट को इतने से ज़्यादा नहीं जानना चाहिए, ताकि न वो बदले और न मैं।
Saturday, May 23, 2020
पिंटू के नन्हें पर
गुमनाम शहर के साधारण से गलियारें में पैदा होता एक सपना,जैसे हर आम इंसान का होता है, एक गाड़ी, एक परिवार और घर हो अपना।ये सपने जनाब बड़ी कठिनाइयों से झुझते हैं,हर छोटे बड़े नौकरी, कारोबार के कंधो पर अपना बसेरा रखते हैं।बस ऐसा ही एक सपना हमारे चार साल के पिंटू का भी हुआ करता था,मुझे डबाइबर बनाना है, बस, इस ही कि रट लगाए रोया करता थाक्या पता शायद पिताजी की सफेद पौशाक उसको भा जो गई थी,या अम्बेसडर में आगे बैठने की ठाट, उसमे आ जो गई थी।
पर अचानक एक दिन पिन्टू को डबाइबर होने में बड़ा गुस्सा आया,जब बीती रात उसने पिताजी को खूब डाँट पीटता पाया।अब पिंटू एक नया पेशा खोजने में जुटा हुआ है
काली पेंट और रंगीन बुशर्ट पहन गलियों में निकल चुका है।
कभी पिंटू को साईकल की पेंचर बनाने में वो पेशा दिखता है,तो कभी वो बर्फ बेचने के लिए रेड़ियो को खोजता हैं,हाथ में ब्रीफ केस ले जाते देख, कभी उन लोगो जैसा बन जाता हैं,तो कभी जलेबी की मीठी चाशनी का स्वाद लिए सो जाता हैं।ये पेशा हर पेशे को देख कर रंग बदलने लगता हैंजब हमारा पिंटू धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है।पिंटू के सपने भी उसकी उम्र की तरह अब बड़े हो रहे हैं,डबाइबर बनने की ज़िद अब ड्राइवर रखने के हो रहे हैं,पिंटू की सफेद अम्बेसडर अब खटारा होने लग गई हैं,और पिंटू के कमरे की दिवार मोटर साईकल से भरी बड़ी हैं।फिर एक दिन,स्कूल के प्रिंसिपल की मोटर कार को देख कर वो बड़ा सपना याद आ जाता हैंपर डाँट पीटने के डर से कोई मेरे साथ आँख मिचौली नहीं खेलेगा का ख्याल,
मास्टरी से कोसो दूर ले जाता हैं।ये डर मन मे रख कर पिंटू मोटर कारो को भी पीछे छोड़ देता हैं,आसमान में उड़ते जहाज़ को देखता है और नया सपना संजो लेता हैं|
पिंटू आज, सुकूँ से पिताजी की अम्बेसडर देख ये सोचते-सोचते सो जाता हैं, किपेशा मिल गया न, क्या पता सपना भी ऐसे पूरा हो जाता हैं।वो पेशा जो उसे आसमान की ऊँचाइयों तक ले जाएगा,पिंटू को क्या पता था, बढ़ती उम्र के साथ उसका छोटा सपना भी बड़ा होता जाएगा।अब पिंटू बड़ा हो चुका था हाथ मे गेंद और बल्ला लिए,और उसके सपने के पीछे रो रहा था उसका बाप, सारा मोहल्ला लिए,वो कहते हैं न, ड्राइवर का बेटा सचिन कैसे बन पाएगा,मेरा लड़का तो होनहार है, घर की गरीबी मिटाएगा|बाप की उम्मीदों तले पिंटू अपना सपना छोड़ गया,गेंद को दूर आसमान में फेंका, और बल्ले को तोड़ गया|वो कहते हैं न, ज़िम्मेदारियों का बोझ बड़ा भारी होता हैंऔर ऐसे ऊँचे-ऊँचे सपनो का टूटना कई बारी होता हैं।
Wednesday, May 20, 2020
और......
मेरा जन्म झारखंड के पलामू जिले के सदर अस्पताल मे हुआ था। कुछ महीनों बाद पिताजी की नौकरी की वजह से हम फ़रीदाबाद आ गए, लोग कहते हैं मैंने चलना वहीं पर सीखा था। उसके बाद पिताजी का तबादला हुआ तो पहले टुंडला और फिर कानपुर और आज कल मैं दिल्ली में रहने लगा हूँ।
इन जगहों में कुछ महीनों से लेकर सालो तक रहने के बाद जब कोई मुझसे ये पूछता हैं कि मैं कहाँ का रहने वाला हूँ, तब कुछ समय के लिए मै एक अलग ही दुविधा में घिर जाता हूँ और ख़ुद से पूछने के लिए बाध्य हो जाता हूँ कि मैं कहाँ का रहने वाला हूँ?
इसका उत्तर अगर समाज के कुछ नियमों को ध्यान मे रख कर दिया जाए तो उत्तर झट से आपकी झोली में होगा, पर अगर उन नियमों को किनारे कर के सोचे तो इस प्रश्न का उत्तर तब तक बदलता रहेगा जब तक आप स्थायी रूप से स्थिर नहीं हो जाते।
जी, तो उन नियमों के अनुसार मैं झारखंड का हुआ, लेकिन मुझे तो झारखंड की मीठी बोली से लेकर हरियाणा के तौर तरीके भी आते हैं, मैं टुंडला की पतली गालियों से लेकर दिल्ली की ऊँची इमारतों में भी रहा हूँ। देखा जाए तो मैंने अपनी जन्मभूमि से ज़्यादा वक़्त बाकी शहरों में बिताया है और सच पूछो तो मुझे याद भी नहीं कि उस वक़्त का झारखंड कैसा था। फिर मैं झारखंड के कैसे हुआ?
ऐसे तो ये प्रश्न की आप कहाँ के रहने वाले हो मुझ पर लागू ही नहीं होता और अगर होता हैं तो मुझे खुली झूट है किसी भी जगह का नाम लेने की, शायद इसही लिए मेरे आस पास के कुछ लोगो को लगता हैं कि मैं झारखंड का हूँ तो कुछ को की कानपुर का।
टुंडला और फ़रीदाबाद के बारे में काफियों को नही पता हैं।
आजकल मैं लोगो को अब ये ही बताता हूँ कि दिल्ली का हूँ ताकि उसके आगे पूछे जाने वाले प्रश्नों से बच सकूँ, शायद आने वाले सालों में मेरी पहचान और भी ज़्यादा लंबी होती जाएगी।
सच पूछो तो अपने गाँव जाकर वहाँ का बनने में मुझे ज़रा सा भी वक़्त नहीं लगता। वही शाम का जमावड़ा, भोर भोर उठ जाना, मोबाइल जैसी दुनिया से कोसो दूर चले जाना, कंधे पर गमझा लेकर हर छोटे बड़े कस्बे में चक्कर लगाना और खेतों में ही सो जाना, ये सब मेरे लिए उतना ही अपना हैं जितना शहर में आकर पूरा इसका विपरित हो जाना।
फिर मैं गाँव का कहलाऊँगा या शहर का, क्योंकि मेरे अंदर गाँव जैसी सादगी बस्ती है तो शहर में रहने का झुझारू स्वभाव भी आ ही गया है।
शायद मैं अनायास ही इतना सोच रहा हूँ, मुझे वहीं करना चाहिए जो करता आया हूँ।
जी तो,
नमस्कार मेरा नाम अनिमेष पांडेय हैं, मेरा जन्म झारखंड में हुआ था पर मेरी बारहवीं तक कि शिक्षा कानपुर से हुई हैं, स्नातक के लिए मैं दिल्ली आ गया और आगे की शिक्षा मैंने फलाने फलाने जगह से ली है और नौकरी......... और घर.......... और ..............
Tuesday, May 19, 2020
दो अयोध्या
हे राम!
अयोध्या इस वक़्त तुम्हारा अयोध्या नहीं,
योद्धाओ की लंका हैं
"मानस" तुम्हारा चरित्र नहीं
चुनाव का डंका हैं।
――कुँवर नारायण
अगर आपने अयोध्या के इतिहास को समझा है, तो यक़ीनन आपने उसे बदलते देखा है, अगर आपने उसे बदलते देखा है तो यक़ीनन आपने उसे जूझते देखा है और अगर आपने उसे जूझते देखा है तो यक़ीनन आपके विचार भी इन पंक्तियों से मेल खाते होंगे। ये शहर सच मायने में बहुत सारा भार लेकर जी रहा है। किसी के आस्था का भार, किसी के प्रेम का भार, किसी के नफ़रत का भार, किसी के दर्द का भार, तो किसी के षड्यंत्र का भार। ये भार और कुछ नहीं बस इस दुर्बल शहर पर ज़िम्मेदारियों का बोझ बड़ा रहे हैं।
आप अगर इस शहर को इसके नाम से जुड़े कई नामो से हट कर देखें तो आपको पता चलेगा कि बात इतनी भी पेचीदा नहीं है जितनी ज्ञात पड़ती हैं। साधारण सरल से लोग, उनकी साधारण सी जीवन शैली और बिना लसुन प्याज़ का खाना। बस इतना ही तो अयोध्या चाहिए, लेकिन शायद इस अयोध्या को दूसरे अयोध्या के समानांतर ही रहना होगा, जहाँ इस जीवन के साथ पनपता है एक डर जो यू तो दबा रहेगा पर कब कहाँ क्या हो जाए और ये डर फिर जीवित हो जाए, इसपर जितनी कम बात की जाए उतना बेहतर हैं।
हमारे देश में एक शहर के विकास की राह उसके नाम से जुड़े विवाद पर निर्भर हैं, जितना बड़ा विवाद उतनी ज़्यादा उस शहर पर रोशनी और उतनी ही आसान उसके विकास की राह, कभी कभी लगता हैं शायद इसही कारण मेरा शहर विकसित नही हो पा रहा क्योंकि मेरे शहर से न कोई विवाद जुड़ा हुआ है और न भविष्य में ऐसे कोई आसार नजर आते हैं।
खैर बात करे अयोध्या कि तो पेरिस सिंड्रोम की तरह आपको भी अयोध्या सिंड्रोम हो जाए तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं हैं, क्योंकि जिस जगह जाने के लिए आप इतने उत्तेजित हैं उस तक पहुँचने की मेहनत मशक्कत के बाद आप बस एक प्रश्न लिए वापिस आएंगे, की क्यों?, आखिर क्यों?
मुझे माफ़ कीजिएगा क्योंकि जितना आप मुझसे उम्मीद कर रहे है, शायद मैं उतना बात ही नहीं पाऊँगा, या शायद बताना नहीं चाहता। कुछ भी हो सकता हैं, झूठ भी हो सकता हैं और सच भी। पता नहीं| ये तो आपके और मेरे अयोध्या के समझ पर निर्भर करता है। मैंने 2019 के जून में अयोध्या ऐसा देखा शायद आप जब जाए तो एक नया अयोध्या देखें।
बस इस एक बात का मलाल हैं कि चाह कर भी मैं कुँवर नारायण की इन पंक्तियों को झुठला नही पाया, मैं दोनों अयोध्या को अलग अलग देख नहीं पाया। ये सियासी रंग ऐसा घुल गया है अयोध्या शहर से की अब दोनों अयोध्या के बीच एक लकीर खींच कर दोनों को अलग करना असम्भव सा लगने लगा है।
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