Friday, May 29, 2020

मैं ढूँढ़ रहा हूँ

मैं ढूँढ़ रहा हूँ
कही रास्तो पर तो कही कोनो मे,
इंसान तो मिल रहे हैं ,
उनकी इंसानियत को ढूँढ़ रहा हूँ
कलम उठाने वालों की काली स्याही को ढूँढ़ रहा हूँ,
रुह काँप जाने वाली कहानियों को ढूँढ़ रहा हूँ,
उन कहानियों में अपने स्वार्थ को ढूँढ़ रहा हूँ।
मैं स्वार्थी हूँ,
अपना काम बख़ूबी निभा रहा हूँ|
कटाक्ष भरता हूँ और, भूलता जा रहा हूँ|
गलती तुम्हारी है जो मुझसे उम्मीदे कर रहे हो,
इन आस भारी नज़रों से मुझे देख रहे हो|
मैं कहाँ आज तक सामने आया हूँ, जो आज आऊँगा
बस सवालों के क़तार लगा कर, फिर मर जाऊँगा
मेरी इंसानियत को मत परखों जो बची नहीं,
ये मैं अपना हाल बता रहा हूँ, तुम्हारा नहीं,
ये मैं अपनी बात कर रहा हूँ , तुम्हारी नहीं|
मानो तो तुम भी कटाक्ष भरो,
हालातों को सुधारने की कोशिश नहीं|
किसी और से उम्मीद बाँधो और शांत हो जाओ,
मरने दो जो मर रहे हैं, बचने की खुशी मनाओ|
अगर तुम नहीं रहोगे तो ये सब कौन सोचेगा,
हर एक अगर लड़ेगा तो उनकी बातें कौन करेगा?
चलो अपने काम में फिर लग जाते हैं
जब तक नया विषय नहीं मिलता, मर जाते हैं।
ये समाज नहीं सुधरेगा और मरने तो नहीं देगा
कुछ निर्दयी ज़रूर करेगा और कटाक्ष भरने देगा।
बस तब तक ही तो मरना हैं,
शांत रहना है और स्वार्थ ढूँढ़ना हैं।

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