कोई मुझसे बचपन मे पूछता कि मुझे कहाँ जाने का मन करता है तो मैं कहता रेनुकूट।
घबराइए मत, इस शहर में ऐसा कुछ भी खास नहीं है जिसके लिए ये प्रसिद्ध हो और आपको अपनी ओर खींच कर ले जाए।
क्या पता इस शहर को देख लेने के बाद यहाँ दोबारा जाने का खायल भी न आए, शायद रेनुकूट वैसा हैं ही नहीं जैसी तस्वीर मेरे दिमाग में अभी तक बनी हुई हैं। शायद लोगो का इस जगह को न जान पाना बिल्कुल सही है, शायद ये मैं ही हूँ जो इसे इतना खास बनाने की कोशिश में लगा हुआ है।
मेरे गाँव जाने के दो रेल रूट हैं, एक जिसमे रेनुकूट आता हैं और एक जिसमे नहीं। अक्सर अच्छी ट्रेन से जाने की होड़ में मैं हमेशा रेनुकूट से दूर रह जाता था| कैसी बेवकूफ़ी हैं न कि कोई साधारण ट्रेन के स्लीपर क्लास में बैठ कर जाने की ज़िद करे, वो भी सिर्फ पंद्रह मिनट के साधारण से शहर को देखने के लिए जिसके बारे में लोगो को पता तक नहीं हैं, लेकिन, वो कहते हैं न कि तीर्थ से ज़्यादा सुखन्द तीर्थयात्रा मे होती हैं। मेरी इस तीर्थयात्रा का सबसे सुकूँ भरा लम्हा उस पंद्रह मिनट के शहर को देखने का होता था।
छोटे बड़े टीले, उनके पीछे से निकलता फैक्ट्री का धुँआ, छोटे छोटे कस्बे जो कभी ट्रेन से ऊपर, कभी उसकी सतेह पर तो कभी उसके नीचे, धूप में चमकती फैक्ट्री, खपड़े के मकान, पहाड़ और तीन या चार प्लेटफार्म का छोटा सा स्टेशन जहाँ ट्रेन सिर्फ दो मिनट के लिए रुकती थी, जिसकी नाराज़गी मेरी रेल विभाग से हमेशा रहेगी । बस इतने से शहर के लिए आखिर कौन इतनी तकलीफ़े उठता हैं, और क्यों?...............
न जाने कितने साल हो गए रेनुकूट को वैसा का वैसा देखे, आख़िर कब देखा था ये भी याद नहीं। मुझे खुशी हैं इस बात कि की मैं कभी भी इस शहर को अच्छे से देख नहीं पाया, शायद इस ही वजह से ऐसा कुछ लिख भी पा रहा हूँ, शायद इसे जान लेने के बाद मेरा नज़रिया और मेरी आँखों में बसी इसकी तस्वीर दोनों बदल जाए।......
इसलिए मैंने तय किया है कि मुझे रेनुकूट को इतने से ज़्यादा नहीं जानना चाहिए, ताकि न वो बदले और न मैं।
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