Sunday, December 22, 2019

अधूरे लेखक की अधूरी दास्तां।

अधूरे शब्द,अधूरे वाक्य,अधूरे पन्ने कुछ बुदबुदा रहे हैं,
कलमों के साथवाली दोस्ती के भी अब ख़याल आ रहे हैं,
खाली रखी कुर्सी ठंडी पड़ रही हैं,
और मेज़ बिखरे हुए अखबरों से सनी पड़ी हैं।
एक दूसरे के साथ मिल कर कुछ पहल करने को ये सोच रहे हैं
अपने इकलौते लेखक के आने की खबरों को खोज रहे हैं।
लेखक लगता हैं कही खो  गया हैं,
अपने धर्मों को पीछे छोड़ गया हैं।
अधूरे बुने पात्रो को पूरा होने की कमी खल रही हैं,
कहानियों के अंत होने की तिथि बस टल रही हैं।
भला इतना आलसी लेखक कौन होता हैं
जो अपनी अधूरी रचनाओ को पीछे छोड़ देता हैं।
वो अपने व्यस्त ज़िन्दगी से कुछ वक्त नहीं निकाल रहा,
बिखरे पड़े अपने कमरे तक को नहीं संभाल रहा।
वो पन्ने स्याही के लिए तरस रहे है,
अपने ज़िंदा होने की गवाही के लिए तरस रहे हैं,
कमरे मे एक मायूसी सी छा गई हैं,
खिड़की से आती रोशनी भी अब जा रही हैं।
लगता हैं आज फिर लेखक के इंतेज़ार में दिन कट जाएगा,
न कोई किस्सा, न कहानी और न ही कोई पात्र लिखा जाएगा
इतने दिनों का इंतज़ार पहले कभी नहीं हुआ
क्या पता इस लेखक की नियत को क्या हुआ?
कही उसने लिखना छोड़ तो नहीं दिया?
या अपने ख़यालो के रुख़ को कही और मोड़ तो नहीं दिया?
अब वो इस ओर कभी नहीं आता हैं,
अपनी कल्पनाओं को इन पन्नो तक नहीं पहुँचाता हैं।
अधूरी रह गईं चीज़ों के बारे में अब और क्या ही कहूँ,
सोच रहा हूँ इस कविता को अधूरा छोड़ दूँ और कुछ न लिखूँ।
जब लेखक अपनी रचनाओं को ही नहीं लिख रहा,
तो मैं क्यों उसकी जिंदगी में यूँ दखल दे रहा,
जब उसमे अपनी कहानियों को पूरा करने का साहस आ जाएगा,
मेरे इस कविता को भी उसका सही अंत मिल जाएगा।
तब तक इस लेखक और इसकी कहानी को यही छोड़ देते हैं,
चलिए किसी अन्य को ढूंढ़ते हैं और उसकी कहानी में मशगूल हो लेते हैं।

















Friday, December 13, 2019

विडंबना

ये किस्सा कैसे शुरू करू मुझे समझ नहीं आ रहा?
मुझे नहीं पता कि इतने खूबसूरत समय को बताने के लिए क्या मेरे पास ऐसी कोई शुरूआत हैं भी, जो इसकी कीमत को कम न करें , चलिए कोई बात नहीं ,मैं ये काम आप पर छोड़ता हूँ।
इस समय को मैंने इतनी बार जिया हैं और कितनी बार जीना चाहता हूँ इस बात को सोच कर मुझे बहुत खुशी होती हैं कि, इतने आगे आ जाने के बाद भी , इतना कुछ नया देख लेने के बाद भी ,उस समय को वापिस जीने की लालसा अभी भी वैसी की वैसी हैं जो उन दिनों के जून के महीने में हुआ करती थीं।
जून का महीना!
मौलश्री का पेड़!
दोपहर की गर्मी!
और वो बारिश!
कितना कुछ बदल गया है, हैं ना?
मुझे तीन साल हो चुके हैं इन सब को एक साथ एक ही महीने में देखे । दो साल पहले गया था मैं ,पर वो महीना कोई और था, वो दोपहर की गर्मी कुछ और थी , वो बारिश कुछ कम थी और वो मौलश्री का पेड़ , वो अब नहीं था।

ऐसा नहीं हैं की कोई और पेड़ नहीं था या गर्मी नहीं थी या बारिश नहीं हो रही थीं । वो सब कुछ था बस जून के महीने जैसा नहीं था।
 आप किसी भी चीज़ के बारे मे जब ये कहते हो कि, देखो न ,कितना कुछ बदल गया हैं ।ये समान यहाँ पर नही था या ये चीज़ कब आयी?, या यहाँ पर एक गुलदस्ता था वो अब यहाँ नहीं हैं। भले ही वो बदलाव आपको अच्छा लग रहा हो, पर  एक टीस रह जाती हैं कि ,"अब ये जगह वैसी नहीं रही जैसी हुआ करती थीं" ... आप न चाहते हुए भी उस जगह को उसके पुराने रंग रूप में अपने दिमाग में बुन्ने लगते हो।

मैं भटक रहा हूँ क्योंकि मुझे वो बदलाव पसंद नहीं , उस बदलाव के बारे में सोचना पसंद नहीं ,उस बदलाव के बारे में बात करना पसंद नहीं , पर फिर भी मैं लिख रहा हूँ क्योंकि मुझे इस छोटे से कमरे के कैद में मीलो दूर के उस जून के महीने को जीना हैं , बार बार जीना हैं ।
पर मैं कैसे लिख दूँ वो सब जिसके बारे मे सोच कर अभी जो बदलाव  मेरे हाथ में हैं ,मैं उससे दूर भागने लगूँगा ,क्या फायदा उस बारिश के बारे में लिखने का जो अब होगी ही नहीं।  क्या फायदा उस जून के महीने के बारे में लिखने का जिस महीने में मैं कभी वहाँ जाऊँगा ही नहीं ।और अब क्या फायदा उस पेड़ के बारे में लिखने का जब मेरे अलावा कोई उसे वहाँ लगाएगा ही नहीं।
सब कुछ कितना बदल गया हैं न और मैं कुछ कर भी नहीं पाया । पर कैसे ही करता ,जब ये सब कुछ हो रहा था तब मुझे उसकी कोई परवाह ही कहाँ थी और अब जब सब कुछ बदल चुका हैं तो  मैं उस बदलाव के बारे में लिखने को बैठा हूँ , नहीं, मैं नही लिख पाउँगा।

मैं जब भी कुछ ऐसा लिखने बैठता हूँ, मैं इस ही विडंबना में होता हूँ कि मुझे लिखना चाहिए भी या नहीं, हर बार इसही असमंजस में घिरा रहता हूँ  , सच बताओ क्या आपके साथ भी ऐसा होता हैं?

Wednesday, December 11, 2019

सड़क

खाली सड़क के एक कोने के कोने में सहमा बैठा मैं।
अन्देखी अनकहीं दासताओ को कुरेदने की कोशिशें करता मैं।
खाली पन्नो पर स्याही की बौझारे करने को तरसता मैं।
दोनो हाथों से चाय को महसूस करते चुस्कियाँ लेता मैं।
धीरे धीरे अपनी आँखों को नम होता देखता मैं।
अपने हृदय के चलने से दौड़ने तक कि दूरी में उसका साथ निभाता मैं।
ऐसा कब से बन गया और क्युहि बन गया मैं?

क्यों शब्दो के इशारे कही और ही ले गए न आपको!,
ये उन वक़्त की दासताओ की बातें नहीं कर रहा जब खुद ही को नहीं ढूंढ़ पाता था मैं,
ये तो बस कुछ दिन पहले से हो रहे हालातो से रुबरू करवा रहा हूँ मैं।

यकीन मानो बड़ी बैचैनी से तुम्हारा इंतेज़ार कर रहा था मैं,
या यू मानो की अपने नाम के मायने को एक बाए फिर से जी रहा था मैं।
इतना प्यार उस सड़क से कुछ महीने कभी नहीं हुआ जितना उस दिन करने लगा था मैं।
जब एक बार फिर बदलते हालातो से दोस्ती करने को सोचने लगा था मैं,
पर क्यों?
ऐसा क्युहि कर रहा था मैं?
क्योंकि उन सड़को पर तुम्हारे साथ बिताए वक़्तों के रंगों को और भी पक्का रंगने लगा था मैं।











हार

न जाने ये कैसी आहट हैं जो मुझे सोने नहीं दे रही,
मुझे डर लग रहा हैं इस आहट से।
वैसा डर जो ऊचाइयों पर खड़े होकर ज़मीन की ओर देखने से होता हैं,
मैं अपने शरीर की गर्मी को महसूस कर पा रहा हूँ।
ऐसा लग रहा है मानो मै आग के सामने खड़ा हूँ और उसकी तेज़ लपटे सीधा मेरे चेहरे पर पड़ रही हैं।
इस आहट ने मेरी इस रात को असहनीय बना दिया हैं,
लगता हैं मुझे सो जाना चाहिए , पर ये कोशिश तो मै पिछले कई घंटों से कर रहा हूँ।
क्या मुझे दरवाज़ा खोल कर एक बार देख लेना चाहिए कि कोन हैं
या मुझे खुद को रोक लेना चाहिए ?
मुझे डर और उत्तेजना दोनो ने घेर रखा हैं कि, ये आहट मुझसे दोस्ती करना चाहती हैं या मुझे नुक्सान पहुँचाने आई हैं?
मैं हताश हूँ और अपनी इस बुज़दिली से नाराज़ भी,
कितना कमज़ोर महसूस कर रहा हूँ मैं इसके आगे।
मुझे लगता हैं मुझे हार मान लेनी चाहिए ये लड़ाई मेरे बस की नहीं, या यूं कहो कि मैं इस लड़ाई के लिए बना ही नहीं।
धिक्कार हैं मुझ जैसे इंसान पर जो अपने मन मैं इस आहट के लिए डर बना कर बैठा हैं और इससे हार चुका हैं।
मुझे नहीं लगता मैं इस ग्लानि के साथ जी भी पाउँगा की मैं खुद को ये लड़ाई जीता नहीं पाया। ओह! माफ करना शायद मैं गलत बोल गया, की मैं इस ग्लानि के साथ जी भी पाउँगा की मैं लड़ने की कोशिश नहीं कर पाया
सुनो, तुम मेरे साथ मत रहना, मैं तुम्हे भी एक हारा हुआ इंसान बना दूँगा।

क्या किया जाए

  क्यों न इस बारे मे लिखा जाए कि, " किस बारे मे लिखा जाए? " सत्ता, सहेली, या शाम, खेल, खिलौना, खाली जाम, घर के ...