Saturday, May 23, 2020

पिंटू के नन्हें पर



गुमनाम शहर के साधारण से गलियारें में पैदा होता एक सपना,
जैसे हर आम इंसान का होता है, एक गाड़ी, एक परिवार और घर हो अपना।
ये सपने जनाब बड़ी कठिनाइयों से झुझते हैं,
हर छोटे बड़े नौकरी, कारोबार के कंधो पर अपना बसेरा रखते हैं।

बस ऐसा ही एक सपना हमारे चार साल के पिंटू का भी हुआ करता था,
मुझे डबाइबर बनाना है, बस, इस ही कि रट लगाए रोया करता था
क्या पता शायद पिताजी की सफेद पौशाक उसको भा जो गई थी,
या अम्बेसडर में आगे बैठने की ठाट, उसमे आ जो गई थी।
 
पर अचानक एक दिन पिन्टू को डबाइबर होने में बड़ा गुस्सा आया,
जब बीती रात उसने पिताजी को खूब डाँट पीटता पाया।
अब पिंटू एक नया पेशा खोजने में जुटा हुआ है 
काली पेंट और रंगीन बुशर्ट पहन गलियों में निकल चुका है।
 
कभी पिंटू को साईकल की पेंचर बनाने में वो पेशा दिखता है,
तो कभी वो बर्फ बेचने के लिए रेड़ियो को खोजता हैं,
हाथ में ब्रीफ केस ले जाते देख, कभी उन लोगो जैसा बन जाता हैं,
तो कभी जलेबी की मीठी चाशनी का स्वाद लिए सो जाता हैं।
ये पेशा हर पेशे को देख कर रंग बदलने लगता हैं
जब हमारा पिंटू धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है।

पिंटू के सपने भी उसकी उम्र की तरह अब बड़े हो रहे हैं,
डबाइबर बनने की ज़िद अब ड्राइवर रखने के हो रहे हैं,
पिंटू की सफेद अम्बेसडर अब खटारा होने लग गई हैं,
और पिंटू के कमरे की दिवार मोटर साईकल से भरी बड़ी हैं।

फिर एक दिन,
स्कूल के प्रिंसिपल की मोटर कार को देख कर वो बड़ा सपना याद आ जाता हैं
पर डाँट पीटने के डर से कोई मेरे साथ आँख मिचौली नहीं खेलेगा का ख्याल, 
मास्टरी से कोसो दूर ले जाता हैं।
ये डर मन मे रख कर पिंटू मोटर कारो को भी पीछे छोड़ देता हैं,
आसमान में उड़ते जहाज़ को देखता है और नया सपना संजो लेता हैं|
 
पिंटू आज, सुकूँ से पिताजी की अम्बेसडर देख ये सोचते-सोचते सो जाता हैं, कि
पेशा मिल गया न, क्या पता सपना भी ऐसे पूरा हो जाता हैं।
वो पेशा जो उसे आसमान की ऊँचाइयों तक ले जाएगा,
पिंटू को क्या पता था, बढ़ती उम्र के साथ उसका छोटा सपना भी बड़ा होता जाएगा।

अब पिंटू बड़ा हो चुका था हाथ मे गेंद और बल्ला लिए,
और उसके सपने के पीछे रो रहा था उसका बाप, सारा मोहल्ला लिए,
वो कहते हैं न, ड्राइवर का बेटा सचिन कैसे बन पाएगा,
मेरा लड़का तो होनहार है, घर की गरीबी मिटाएगा|

बाप की उम्मीदों तले पिंटू अपना सपना छोड़ गया,
गेंद को दूर आसमान में फेंका, और बल्ले को तोड़ गया|
वो कहते हैं न, ज़िम्मेदारियों का बोझ बड़ा भारी होता हैं 
और ऐसे ऊँचे-ऊँचे सपनो का टूटना कई बारी होता हैं।

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