Tuesday, May 19, 2020

दो अयोध्या





हे राम!
अयोध्या इस वक़्त तुम्हारा अयोध्या नहीं,
योद्धाओ की लंका हैं
"मानस" तुम्हारा चरित्र नहीं
चुनाव का डंका हैं।
                                                                                            ――कुँवर नारायण

अगर आपने अयोध्या के इतिहास को समझा है, तो यक़ीनन आपने उसे बदलते देखा है, अगर आपने उसे बदलते देखा है तो यक़ीनन आपने उसे जूझते देखा है और अगर आपने उसे जूझते देखा है तो यक़ीनन आपके विचार भी इन पंक्तियों से मेल खाते होंगे। ये शहर सच मायने में बहुत सारा भार लेकर जी रहा है। किसी के आस्था का भार, किसी के प्रेम का भार, किसी के नफ़रत का भार, किसी के दर्द का भार, तो किसी के षड्यंत्र का भार। ये भार और कुछ नहीं बस इस दुर्बल शहर पर ज़िम्मेदारियों का बोझ बड़ा रहे हैं।

आप अगर इस शहर को इसके नाम से जुड़े कई नामो से हट कर देखें तो आपको पता चलेगा कि बात इतनी भी पेचीदा नहीं है जितनी ज्ञात पड़ती हैं। साधारण सरल से लोग, उनकी साधारण सी जीवन शैली और बिना लसुन प्याज़ का खाना। बस इतना ही तो अयोध्या चाहिए, लेकिन शायद इस अयोध्या को दूसरे अयोध्या के समानांतर ही रहना होगा, जहाँ इस जीवन के साथ पनपता है एक डर जो यू तो दबा रहेगा पर कब कहाँ क्या हो जाए और ये डर फिर जीवित हो जाए, इसपर जितनी कम बात की जाए उतना बेहतर हैं।

हमारे देश में एक शहर के विकास की राह उसके नाम से जुड़े विवाद पर निर्भर हैं, जितना बड़ा विवाद उतनी ज़्यादा उस शहर पर रोशनी और उतनी ही आसान उसके विकास की राह, कभी कभी लगता हैं शायद इसही कारण मेरा शहर विकसित नही हो पा रहा क्योंकि मेरे शहर से न कोई विवाद जुड़ा हुआ है और न भविष्य में ऐसे कोई आसार नजर आते हैं।

खैर बात करे अयोध्या कि तो पेरिस सिंड्रोम की तरह आपको भी अयोध्या सिंड्रोम हो जाए तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं हैं, क्योंकि जिस जगह जाने के लिए आप इतने उत्तेजित हैं उस तक पहुँचने की मेहनत मशक्कत के बाद आप बस एक प्रश्न लिए वापिस आएंगे, की क्यों?, आखिर क्यों?

मुझे माफ़ कीजिएगा क्योंकि जितना आप मुझसे उम्मीद कर रहे है, शायद मैं उतना बात ही नहीं पाऊँगा, या शायद बताना नहीं चाहता। कुछ भी हो सकता हैं, झूठ भी हो सकता हैं और सच भी। पता नहीं|  ये तो आपके और मेरे अयोध्या के समझ पर निर्भर करता है। मैंने 2019 के जून में अयोध्या ऐसा देखा  शायद आप जब जाए तो एक नया अयोध्या देखें।

बस इस एक बात का मलाल हैं कि चाह कर भी मैं कुँवर नारायण की इन पंक्तियों को झुठला नही पाया, मैं दोनों अयोध्या को अलग अलग देख नहीं पाया। ये सियासी रंग ऐसा घुल गया है अयोध्या शहर से की अब दोनों अयोध्या के बीच एक लकीर खींच कर दोनों को अलग करना असम्भव सा लगने लगा है।

No comments:

Post a Comment

क्या किया जाए

  क्यों न इस बारे मे लिखा जाए कि, " किस बारे मे लिखा जाए? " सत्ता, सहेली, या शाम, खेल, खिलौना, खाली जाम, घर के ...