Saturday, June 13, 2020

96



मुझे क़िताब, लेख, कहानियाँ, ये सब पढ़ने में बाकियों के मुकाबले ज्यादा समय लगता हैं। जब मैं लोगो को ये बोलतें देखता हूँ कि कोई क़िताब उन्होंने एक दिन में पढ़ डाली, पर मैंने तो उस क़िताब को बीच में ही कहीं छोड़ दिया था| यह ख्याल मुझे कहीं न कहीं उन सब के सामने एक बौना पाठक बना देता हैं। इसलिए शायद कई किताबें तो मैंने ज़बरदस्ती पढ़ी ताकि खुद को खुद की नज़रों में बौना बनने से बचा सकूँ। 

ये सब तब की बात हैं जब मैं स्कूल में हुआ करता था, तब दुनिया काफी छोटी और सपनें बड़े सिमटे से हुआ करते थे।

विश्वविद्यालय आकर जब कुछ नया करने का सोचा तब समझ आया कि मैं एक कमज़ोर पाठक क्यों था। 

कभी आपने महसूस किया है कि आप किसी कहानी या किताब को पढ़ने बैठे हैं, और उस किताब या कहानी के शब्द, किस्से आपको किसी और कहानी या किस्सों में ले जाए, जिसे आपने जी हैं या जिसकी कल्पना आपने करी हैं| या फिर आपको उस खुली सड़क पर ले जाए जहाँ आप बिना किसी बाधा के उस शब्द या उस किस्से या उस कहानी से खेलने लग जाए?



मेरे साथ अक्सर यहीं होता हैं| न जाने कब कौनसा शब्द मुझे किस कहानी में ले जाए,पता भी नही चलता और मैं कुछ और ही सोचने लगता हूँ। फिर जब लगता हैं कि ये किताब खत्म करनी है और वापिस आता हूँ तो याद ही नहीं रहता कि असल में मैं पढ़ क्या रहा था| वो पन्ना या पद नए सिरे से पढ़ने पर समझ आता हैं कि ये कहानी तो अलग है| न जाने ऐसा मेरे साथ कितनी ही बार हो जाता हैं जब ऐसे ख़याल आने पर मैं फट से अपना फ़ोन निकाल कर नोट्स मे उसके बारे में कुछ लिख लेता हूँ ताकि मुझे याद रहे और उसके बारे में कुछ लिख सकूँ।



मेरे नोट्स में कुछ 97 ऐसे ख़याल छिपे हुए हैं जिन पर एक बार फिर से विचार करना बाकि हैं।
नहीं, 96।

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