अधूरे शब्द,अधूरे वाक्य,अधूरे पन्ने कुछ बुदबुदा रहे हैं,
कलमों के साथवाली दोस्ती के भी अब ख़याल आ रहे हैं,
खाली रखी कुर्सी ठंडी पड़ रही हैं,
और मेज़ बिखरे हुए अखबरों से सनी पड़ी हैं।
एक दूसरे के साथ मिल कर कुछ पहल करने को ये सोच रहे हैं
अपने इकलौते लेखक के आने की खबरों को खोज रहे हैं।
लेखक लगता हैं कही खो गया हैं,
अपने धर्मों को पीछे छोड़ गया हैं।
अधूरे बुने पात्रो को पूरा होने की कमी खल रही हैं,
कहानियों के अंत होने की तिथि बस टल रही हैं।
भला इतना आलसी लेखक कौन होता हैं
जो अपनी अधूरी रचनाओ को पीछे छोड़ देता हैं।
वो अपने व्यस्त ज़िन्दगी से कुछ वक्त नहीं निकाल रहा,
बिखरे पड़े अपने कमरे तक को नहीं संभाल रहा।
वो पन्ने स्याही के लिए तरस रहे है,
अपने ज़िंदा होने की गवाही के लिए तरस रहे हैं,
कमरे मे एक मायूसी सी छा गई हैं,
खिड़की से आती रोशनी भी अब जा रही हैं।
लगता हैं आज फिर लेखक के इंतेज़ार में दिन कट जाएगा,
न कोई किस्सा, न कहानी और न ही कोई पात्र लिखा जाएगा
इतने दिनों का इंतज़ार पहले कभी नहीं हुआ
क्या पता इस लेखक की नियत को क्या हुआ?
कही उसने लिखना छोड़ तो नहीं दिया?
या अपने ख़यालो के रुख़ को कही और मोड़ तो नहीं दिया?
अब वो इस ओर कभी नहीं आता हैं,
अपनी कल्पनाओं को इन पन्नो तक नहीं पहुँचाता हैं।
अधूरी रह गईं चीज़ों के बारे में अब और क्या ही कहूँ,
सोच रहा हूँ इस कविता को अधूरा छोड़ दूँ और कुछ न लिखूँ।
जब लेखक अपनी रचनाओं को ही नहीं लिख रहा,
तो मैं क्यों उसकी जिंदगी में यूँ दखल दे रहा,
जब उसमे अपनी कहानियों को पूरा करने का साहस आ जाएगा,
मेरे इस कविता को भी उसका सही अंत मिल जाएगा।
तब तक इस लेखक और इसकी कहानी को यही छोड़ देते हैं,
चलिए किसी अन्य को ढूंढ़ते हैं और उसकी कहानी में मशगूल हो लेते हैं।
कलमों के साथवाली दोस्ती के भी अब ख़याल आ रहे हैं,
खाली रखी कुर्सी ठंडी पड़ रही हैं,
और मेज़ बिखरे हुए अखबरों से सनी पड़ी हैं।
एक दूसरे के साथ मिल कर कुछ पहल करने को ये सोच रहे हैं
अपने इकलौते लेखक के आने की खबरों को खोज रहे हैं।
लेखक लगता हैं कही खो गया हैं,
अपने धर्मों को पीछे छोड़ गया हैं।
अधूरे बुने पात्रो को पूरा होने की कमी खल रही हैं,
कहानियों के अंत होने की तिथि बस टल रही हैं।
भला इतना आलसी लेखक कौन होता हैं
जो अपनी अधूरी रचनाओ को पीछे छोड़ देता हैं।
वो अपने व्यस्त ज़िन्दगी से कुछ वक्त नहीं निकाल रहा,
बिखरे पड़े अपने कमरे तक को नहीं संभाल रहा।
वो पन्ने स्याही के लिए तरस रहे है,
अपने ज़िंदा होने की गवाही के लिए तरस रहे हैं,
कमरे मे एक मायूसी सी छा गई हैं,
खिड़की से आती रोशनी भी अब जा रही हैं।
लगता हैं आज फिर लेखक के इंतेज़ार में दिन कट जाएगा,
न कोई किस्सा, न कहानी और न ही कोई पात्र लिखा जाएगा
इतने दिनों का इंतज़ार पहले कभी नहीं हुआ
क्या पता इस लेखक की नियत को क्या हुआ?
कही उसने लिखना छोड़ तो नहीं दिया?
या अपने ख़यालो के रुख़ को कही और मोड़ तो नहीं दिया?
अब वो इस ओर कभी नहीं आता हैं,
अपनी कल्पनाओं को इन पन्नो तक नहीं पहुँचाता हैं।
अधूरी रह गईं चीज़ों के बारे में अब और क्या ही कहूँ,
सोच रहा हूँ इस कविता को अधूरा छोड़ दूँ और कुछ न लिखूँ।
जब लेखक अपनी रचनाओं को ही नहीं लिख रहा,
तो मैं क्यों उसकी जिंदगी में यूँ दखल दे रहा,
जब उसमे अपनी कहानियों को पूरा करने का साहस आ जाएगा,
मेरे इस कविता को भी उसका सही अंत मिल जाएगा।
तब तक इस लेखक और इसकी कहानी को यही छोड़ देते हैं,
चलिए किसी अन्य को ढूंढ़ते हैं और उसकी कहानी में मशगूल हो लेते हैं।