Friday, December 13, 2019

विडंबना

ये किस्सा कैसे शुरू करू मुझे समझ नहीं आ रहा?
मुझे नहीं पता कि इतने खूबसूरत समय को बताने के लिए क्या मेरे पास ऐसी कोई शुरूआत हैं भी, जो इसकी कीमत को कम न करें , चलिए कोई बात नहीं ,मैं ये काम आप पर छोड़ता हूँ।
इस समय को मैंने इतनी बार जिया हैं और कितनी बार जीना चाहता हूँ इस बात को सोच कर मुझे बहुत खुशी होती हैं कि, इतने आगे आ जाने के बाद भी , इतना कुछ नया देख लेने के बाद भी ,उस समय को वापिस जीने की लालसा अभी भी वैसी की वैसी हैं जो उन दिनों के जून के महीने में हुआ करती थीं।
जून का महीना!
मौलश्री का पेड़!
दोपहर की गर्मी!
और वो बारिश!
कितना कुछ बदल गया है, हैं ना?
मुझे तीन साल हो चुके हैं इन सब को एक साथ एक ही महीने में देखे । दो साल पहले गया था मैं ,पर वो महीना कोई और था, वो दोपहर की गर्मी कुछ और थी , वो बारिश कुछ कम थी और वो मौलश्री का पेड़ , वो अब नहीं था।

ऐसा नहीं हैं की कोई और पेड़ नहीं था या गर्मी नहीं थी या बारिश नहीं हो रही थीं । वो सब कुछ था बस जून के महीने जैसा नहीं था।
 आप किसी भी चीज़ के बारे मे जब ये कहते हो कि, देखो न ,कितना कुछ बदल गया हैं ।ये समान यहाँ पर नही था या ये चीज़ कब आयी?, या यहाँ पर एक गुलदस्ता था वो अब यहाँ नहीं हैं। भले ही वो बदलाव आपको अच्छा लग रहा हो, पर  एक टीस रह जाती हैं कि ,"अब ये जगह वैसी नहीं रही जैसी हुआ करती थीं" ... आप न चाहते हुए भी उस जगह को उसके पुराने रंग रूप में अपने दिमाग में बुन्ने लगते हो।

मैं भटक रहा हूँ क्योंकि मुझे वो बदलाव पसंद नहीं , उस बदलाव के बारे में सोचना पसंद नहीं ,उस बदलाव के बारे में बात करना पसंद नहीं , पर फिर भी मैं लिख रहा हूँ क्योंकि मुझे इस छोटे से कमरे के कैद में मीलो दूर के उस जून के महीने को जीना हैं , बार बार जीना हैं ।
पर मैं कैसे लिख दूँ वो सब जिसके बारे मे सोच कर अभी जो बदलाव  मेरे हाथ में हैं ,मैं उससे दूर भागने लगूँगा ,क्या फायदा उस बारिश के बारे में लिखने का जो अब होगी ही नहीं।  क्या फायदा उस जून के महीने के बारे में लिखने का जिस महीने में मैं कभी वहाँ जाऊँगा ही नहीं ।और अब क्या फायदा उस पेड़ के बारे में लिखने का जब मेरे अलावा कोई उसे वहाँ लगाएगा ही नहीं।
सब कुछ कितना बदल गया हैं न और मैं कुछ कर भी नहीं पाया । पर कैसे ही करता ,जब ये सब कुछ हो रहा था तब मुझे उसकी कोई परवाह ही कहाँ थी और अब जब सब कुछ बदल चुका हैं तो  मैं उस बदलाव के बारे में लिखने को बैठा हूँ , नहीं, मैं नही लिख पाउँगा।

मैं जब भी कुछ ऐसा लिखने बैठता हूँ, मैं इस ही विडंबना में होता हूँ कि मुझे लिखना चाहिए भी या नहीं, हर बार इसही असमंजस में घिरा रहता हूँ  , सच बताओ क्या आपके साथ भी ऐसा होता हैं?

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