Wednesday, December 11, 2019

सड़क

खाली सड़क के एक कोने के कोने में सहमा बैठा मैं।
अन्देखी अनकहीं दासताओ को कुरेदने की कोशिशें करता मैं।
खाली पन्नो पर स्याही की बौझारे करने को तरसता मैं।
दोनो हाथों से चाय को महसूस करते चुस्कियाँ लेता मैं।
धीरे धीरे अपनी आँखों को नम होता देखता मैं।
अपने हृदय के चलने से दौड़ने तक कि दूरी में उसका साथ निभाता मैं।
ऐसा कब से बन गया और क्युहि बन गया मैं?

क्यों शब्दो के इशारे कही और ही ले गए न आपको!,
ये उन वक़्त की दासताओ की बातें नहीं कर रहा जब खुद ही को नहीं ढूंढ़ पाता था मैं,
ये तो बस कुछ दिन पहले से हो रहे हालातो से रुबरू करवा रहा हूँ मैं।

यकीन मानो बड़ी बैचैनी से तुम्हारा इंतेज़ार कर रहा था मैं,
या यू मानो की अपने नाम के मायने को एक बाए फिर से जी रहा था मैं।
इतना प्यार उस सड़क से कुछ महीने कभी नहीं हुआ जितना उस दिन करने लगा था मैं।
जब एक बार फिर बदलते हालातो से दोस्ती करने को सोचने लगा था मैं,
पर क्यों?
ऐसा क्युहि कर रहा था मैं?
क्योंकि उन सड़को पर तुम्हारे साथ बिताए वक़्तों के रंगों को और भी पक्का रंगने लगा था मैं।











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