जब घर एक कमरे का हुआ करता था तब ही से उसने सारे बोझ अपने कंधों पर रख लिए थे। एक कमरे का हो या एक कटठे का, उसके बिना घर कभी पूरा हो ही नहीं सकता था। घर के मुख्य शीशे के बगल में टंगा,
चाभियों वाला खुटा।
मुझे याद हैं, बचपन में माँ मुझे अपने गोद में रखकर उसके पास ले जाती थी और घर की सारी चाभियाँ लटका देती थी। पिताजी की साईकल की, घर के अलमारियों की,मेन गेट की, तो हर छोटी बड़ी चाभियाँ सब का बसेरा उसके ही कंधो पर रहा करता था। ऐसा लगता था मानो घर की सारी ज़िम्मेदारियों का बोझ उस पर रख दिया गया हो।
तब गोद में था और अब स्टूल रख कर उस तक पहुँचने की उम्र हो चुकी थी। बड़ी मुश्किल से माँ से बच कर उस पर से घर के गेट की चाभी निकलता था ताकि खेलने जा सकूँ। मेरी ज़िंदगी के सारे कम्पट के पीछे इस खुटी का ही तो साथ था।
घर बड़ा हो गया था और घर के समान भी बढ़ गए थे। समान बढ़ते गए तो चाभियाँ बढ़ती गयी, चाभियाँ बढ़ती गयी तो ज़िम्मेदारिया बढ़ती गयीं, ज़िम्मेदारिया बढ़ती गयी तो खुटी पर बोझ बढ़ता गया, बोझ बढ़ता गया तो और भी ज़्यादा उम्मीदें बंधती गयीं, पर न जाने वो कौनसे धातु से बना था। इतने बोझ का उस पर एक ईंट भर तक का फर्क नहीं पड़ा।
घर में कई लोग आते थे और अपने ज़रूरत की चाभियाँ उस ही पर लटकाते थे। हमारे घर में भले ही किसी को ये पता हो या न हो कि लोग कहाँ पर बैठे हैं, पर ज़रूर पता था कि चाभियाँ कहाँ होंगी। हाँ, चोरी-चबारी का डर लगा रहता था पर ऐसा कभी हुआ नहीं, और अगर होता भी तो हर चोर को लगता हैं कि कीमती समान को छुपा के रखा गया होगा, लेकिन यहाँ इस घर में तो एकदम उसका उल्टा ही था।
हम बड़े ही रहे थे। उम्र से भी और दिमाग से भी। घर बड़ा हो चुका था क्योंकि परिवार बड़ा हो चुका था। आज भी वो चाभी का खुटा ज़िंदा हैं। हाँ, थोड़ा जर्जर ज़रूर हो गया है, पर आज भी बिना किसी शिकायत के वो घर के सारे बोझ उठा लेता हैं।
मुझे लगता हैं उसको इसही में खुशी मिलती होगी, या क्या पता उसने अपने बारे मे कभी सोचा ही नहीं था।
अगर सोचा होता तो उसे ये पता चलता कि उसपर कितना सारा भार हैं और न जाने कितने सालो से है। उसने कभी भी अपनी महत्वकांशा का ज़िक्र ही नहीं किया। किसी कुलि की तरह हम सबका भार अपने काँधे पर रख कर स्थिर रहा, न आगे बढ़ा न पीछे गया। बस खड़ा रहा बिना किसी शिकायत के। जब आप बोझ के साथ स्थिर खड़े हो जाते हो तो बोझ दोगुना हो जाता हैं।
हम सबको उसका होना पता था, पर न होना नहीं। उसने हमें बताया ही नहीं था कि उसके न होने पर ये चाभियाँ कहाँ जाएँगी, या फिर इनकी ज़िम्मेदारी कौन उठाएगा। वो कौन होगा जो बस बिना कुछ बोले, बिना कुछ समझे, निस्वार्थ भाव अपना कर्तव्य निभाता जाएगा।
मेरी शादी को अब कुछ महीने हो चुके थे। सब कुछ एकदम साधारण चल रहा था। फिर एक दिन एक अजीब सी आवाज़ आई। जब अंदर जाकर देखा तो सारी चाभियाँ बिखरी बड़ी थी और वो खुटा अपनी जगह से नीचे गिर गया था।
शायद अब वो कमज़ोर हो चुका था या क्या पता उसे लगा कि उसकी जगह अब किसी नए खुटे को ले लेनी चाहिए।
मुझे बाकी कुछ पता हो या न हो, इतना तो ज्ञात था कि उसने खुद ब खुद ये निर्णय लिया था। क्योंकि दीवार एकदम पक्की थी और न ही उसे तोड़ने की कोशिश की गई थी।
कल सविता बाजार गयी और उसकी जगह ठीक वैसा ही खुटा ले आयी। वो खुटा ठीक उस ही जगह लगा दिया गया।
नया खुटा भी उस पुराने खुटे के जैसा ही था। उतना ही मज़बूत, उतना ही चमकीला और उसही आकार का। मुझे भी नए खुटे से लगाव होने लग गया था, लेकिन एक बात की टीस रह गयी।
उसके बगल में शीशा था पर वो कभी खुद को देख ही नहीं पाया। कभी समझ ही नहीं पाया कि उसके कंधो पर धरे बोझ के नीचे उसने खुद को देखना कब का छोड़ दिया था।
जाते जाते उसने नए खुटे को उसके आने वाले भविष्य और ज़िम्मेदारियों से रूबरू करवा दिया|
मैंने भी उस दिन शीशे में खुद को और फिर उस खुटे को देखा।वो बिल्कुल मेरे बचपन के खुटे जैसा लग रहा था।
ठीक शीशे के बगल में।
(एक पिता ने एक पिता बना दिया।)
20 जून 2020,
21 जून 2020 के लिए
Happy Father's Day
बेहद सुंदर, सबसे सुंदर अंत🏵🌸
ReplyDeleteअंततः सब समझ आया 👌👌
ReplyDeleteसराहनीय 🤹
ReplyDeleteअत्यंत सुंदर। बहुत अनोखी बातें लिखी हैं। ऐसे ही लिखते रहो।
ReplyDeleteIt's amazing. This emotion is beyond one could express, but you have done it so wonderfully with a new perspective.
ReplyDelete