मेरा शरीर ऐसा क्यों नहीं है, मेरे मन की तरह।
क्यों ये मेरे मन से विपरीत रहता हैं?
क्यों इसे लगता हैं कि ये जैसा है बहुत अच्छा हैं, और इसे किसी बदलाव की ज़रूरत नहीं।
मेरा मन एकदम विपरीत रहता हैं| कम से कम शरीर से ही सही पर एकदम अलग।
पाक मन। मिलावटी शरीर।
सच कहता मन। अंधेरे में जीता शरीर।
हल्का शरीर। भारी मन।
मुझे नहीं लगता मैं बिना किसी के मदद के इन दोनों के बीच एक समानांतर भाव ला भी पाउँगा। मैं भले ही बहुत बेबस और लाचार सा लग रहा हूँ पर मैं झूठ नहीं बोल रहा, और देखो न मेरा शरीर, बिल्कुल इसके विपरीत जाकर सबके साथ घुलमिल रहा है।
मुझे लगा कि अपने मन को हल्का करने से आसान तो इस शरीर को भारी करना है तो क्यों न ऐसा किया जाए।

जितना ज़ोर मन को भटकाने में लगता हैं ठीक उतना ही उस हाथ को हिलाने में लग रहा था।
कितना आसान है न ऐसा करना| खुद को मन के जैसा भारी करना।
अब मन हल्का हो गया उस पल में और शरीर भारी।
ये काला माला और लाल सुमेरू मेरे दिल के बहुत क़रीब हैं इससे जुड़ी हर बात, हर इंसान, हर किस्सा भी बहुत अज़ीज़ हैं, इसलिए शायद ये भी मेरे मन कि तरह होना चाहता है।
पाक मन। मिलावटी शरीर।
सच कहता मन। अंधेरे में जीता शरीर।
भारी मन। भारी शरीर
भारी मन। भारी सुमेरू।
सुंदर❤️
ReplyDeleteNYC
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